लोक साहित्य के अध्ययन की समस्याएं
लोक साहित्य
के अध्ययन की समस्याएं बताइये।
लोक साहित्य के अध्ययन की समस्याएं
·
लोक साहित्य का अध्ययन एक खर्चीला कार्य
है जिसके लिए बड़ी धनराशि की आवश्यकता होती है।
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ऐसे लोगों की खोज करना जो जानकारी प्राप्त
करने के लिए प्रश्नमाला की तैयारी कर सकें चुनौती भरा कार्य है।
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अध्ययन सामग्री का पृथक-पृथक संग्रह करना
चुनौती भरा काम है
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लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति के अध्ययन
हेतु बनाई गई टीम के सदस्यों का कुशल होना आवश्यक है।
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लोकगीतों और साहित्य को कैसे प्राप्त किया
जाए यह भी एक चुनौती भरा कार्य है
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अध्ययनकर्ता का स्वयं को क्षेत्र विशेष के
वातावरण में ढाल पाना भी एक चुनौती है
·
ऐसे व्यक्ति को खोज निकालना जिसे लोक
संस्कृति एवं लोक साहित्य की पूर्ण और सही जानकारी हो, एक चुनौती भरा कार्य
है।
1.
किसी भी क्षेत्र के लोक साहित्य और लोक
संस्कृति के अध्ययन के लिए एक व्यक्ति के स्थान पर एक टीम का गठन करना पड़ता है
जिसमें लोक संस्कृति के विविध अंगों की सामग्री एकत्र करने वाले पृथक-पृथक व्यक्ति
हों। उस क्षेत्र के लोगों से किए जाने वाले वार्तालाप, निवेदन करने पर उनके
द्वारा सुनाए जाने वाले लोक गीतों, लोक कथाओं, लोक गाथाओं का संग्रह करने हेतु
टेपरिकार्डर और उस क्षेत्र की तस्वीरें लेने के लिए फोटोग्राफर का भी टीम में होना
अनिवार्य है। कुल मिलाकर यह एक खर्चीला कार्य है जिसके लिए धनराशि का प्रबंध करना एक
चुनौती है।
2.
टीम के सदस्य भी वही व्यक्ति होने चाहिए
जो उस क्षेत्र की भाषा, भूगोल, इतिहास एवं संस्कृति से पूर्णतया परिचित हों। वे पढे-लिखे हों और जिन्हें
लोक संस्कृति की विभिन्न प्रकार की सामग्री के वर्गीकरण का ज्ञान हो, जो क्षेत्रीय लोगों
से जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्नमाला की तैयारी कर सकें। ऐसे लोगों की खोज
करना और उपरोक्त कहे गए गुण उनमें हैं या नहीं, इसकी परख करना एक चुनौती भरा कार्य है।
3.
लोक संस्कृति, नृतत्वविज्ञान, पुरातत्व, लोक साहित्य और उसकी
विभिन्न विधाओं से संबंधित सामग्री का पृथक-पृथक संग्रह करना चुनौती भरा काम है।
4.
उस क्षेत्र के लोगों से वहां की लोक
संस्कृति एवं लोक साहित्य के बारे में सही जानकारी निकलवाना, वहां के लोगों के
धार्मिक अनुष्ठानों, अंधविश्वासों, आभूषणों, लोक दस्तकारी आदि से संबद्ध जानकारी का विवरण तैयार करना चुनौती भरा कार्य
है। हो सकता है एक ही क्षेत्र के लोगों द्वारा बताई गई बातों में भिन्नता हो, ऐसी स्थिति में किसकी
बात को सही माना जाए यह निर्णय करना भी एक बड़ी चुनौती है।
5.
किसी भी क्षेत्र के लोक साहित्य एवं लोक
संस्कृति के अध्ययन हेतु बनाई गई टीम के सदस्यों की लोक साहित्य में रुचि होना, लोक साहित्य को
संग्रह करने. की कुशलता, त्वरित लेखन का गुण होना आवश्यक है। इनके
अलावा उन सदस्यों का होना भी अनिवार्य है जिन्हें टेप रिकार्डर के प्रयोग का सही
ज्ञान हो, अंतर्राष्ट्रीय ध्वनि वैज्ञानिक वर्णमाला का ज्ञान हो, अंतर्राष्ट्रीय नृत्य
रूपों का ज्ञान हो और उन्हें भारतीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय संगीत स्वर - लिपि का ज्ञान होना
अनिवार्य है।
6.
किसी क्षेत्र के लोकगीतकारों के बस्तों से
लोक गीतों को निकालने का कार्य इतना आसान नहीं जितना कि हम समझते हैं। लोकगीतकार
के द्वारा आपका सहयोग न किए जाने पर उस क्षेत्र के लोकगीतों को कैसे प्राप्त किया जाए यह भी एक
चुनौती भरा कार्य है।
7.
यह कार्य एक ही दिन में पूर्ण होने वाला
नहीं होता। आपको उस क्षेत्र की गंदी बस्तियों में जाना पड़ सकता है जहां रहने वाले
स्वयं गंदे और बदबूदार कपड़े पहने रहते हैं। ऐसे में अपने-आप को उस वातावरण में
ढाल पाना भी एक चुनौती है ताकि आप उस क्षेत्र के लोगों से वह सभी जानकारी प्राप्त
कर सकें जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं ।
8.
हो सकता है, उस क्षेत्र के लोग अपरिचित लोगों की टोली
को अपने बीच पाकर किसी अनिष्ट के भय के कारण आपके द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों
का उत्तर न दें। ऐसी स्थिति में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आप उनको अपने
वहां जाने के उद्देश्य के बारे में बताकर उन्हें जानकारी देने के लिए राजी कर
लेंगे। ऐसी दुविधा की स्थिति से निपट पाना भी एक चुनौती है।
9.
यदि उस क्षेत्र के लोग अपनी लोक संस्कृति
के विषय में अधूरी जानकारी रखते हैं तो वे आपको अधूरी जानकारी ही देंगे।
ऐसी स्थिति में आपको उस क्षेत्र के किसी ऐसे व्यक्ति की खोज करनी होगी जिसे वहां
की लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य की पूर्ण और सही जानकारी हो। ऐसे व्यक्ति को खोज
निकालना एक चुनौती भरा कार्य है।
ऊपर ऐसी चुनौतियों का
वर्णन किया गया है, जिनका सामना लोक साहित्य-संग्राहक एवं अध्ययनकर्ता को करना ही पड़ता है।
फिर इस प्रकार के संग्रह - संकलन पर आधारित अध्ययन के उपरान्त एक सबसे बड़ी चुनौती
रहती है कि शीघ्र प्रबंध तो लिख जाता है किंतु ऐसे संग्रहों को प्रकाशित करने वाले
प्रकाशक नहीं मिलते। इस संबंध में कुछ विद्वानों ने यह चिंता व्यक्त की है कि ऐसे
संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाते। भारत में समस्या यह है कि प्रकाशक तो इस संग्रह -
संकलन प्रकाशन में इसलिए पैसा खपाना नहीं चाहता कि उसे उससे कुछ लाभ होने की
सम्भावना नहीं रहती। ऐसी स्थिति में सरकारी या अर्द्ध सरकारी संस्थाओं को चाहिए कि
वह ऐसे संग्रह - संकलनों को प्रकाशित कराएं। हिंदी जगत् में ऐसे लोकगीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकनाट्यों या
प्रकीर्ण साहित्य के संग्रह इसीलिए प्रकाश में नहीं आ पाए हैं। जहां कहीं ऐसे
संग्रह प्रकाशित भी हुए हैं, वे या तो ऐसी संस्थाओं द्वारा ही प्रकाशित
हुए हैं या संग्राहक व अध्ययनकर्ता के व्यक्तिगत प्रयास के कारण, अन्यथा अनेक
अनुसंधानकर्ताओं के पास इस प्रकार के संग्रह होते हैं और प्रकाशक न मिल पाने के
अभाव में प्रकाश में नहीं आ पाते। आवश्यकता इस बात की है कि व्यवस्थित ढंग से कुछ
सरकारी केंद्रीय संगठनों द्वारा इनका प्रकाशन कराया जाए। भारत में ही ऐसा नहीं है।
विदेशों में तो ऐसे अनेक संगठन अमेरिका, इंग्लैंड इत्यादि में हैं जो व्यवस्थित
ढंग से संगृहीत लोक साहित्य की सामग्री को प्रकाशित कराते हैं।
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