HIN-HE-5026, हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा
हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा Posted by: संपादक- मिथिलेश वामनकर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को काव्य के विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे थे वही दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को भी हवा दे रहे थे। कवि व साहित्यकार अपनी उर्वर प्रज्ञा भूमि के कारण युगीन समस्याओं के प्रति अधिक सावधान व संवेदनशील रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के आरम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक भिन्न-भिन्न चरणों में राष्ट्रीय भावनाओ से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातन्त्र्य चेतना का विकास होता रहा। ‘ विप्लव गान ’ शीर्षक कविता में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठी है। ” कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ , जिससे उथल-पुथल मच जाये एक हिलोर इधर से आये , एक हिलोर उधर को जाये नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की प्रलयंकारी आंख खुल जाये। - नवीन भारतेन...
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