मनुष्यता- मैथिलीशरण गुप्त
मनुष्यता पाठ प्रवेश
प्रकृति के अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य में सोचने
की शक्ति अधिक होती है। वह अपने ही नहीं दूसरों के सुख – दुःख का भी ख्याल रखता है और दूसरों के लिए कुछ करने में समर्थ होता है। जानवर जब
चरागाह में जाते हैं तो केवल अपने लिए चर कर आते हैं, परन्तु मनुष्य ऐसा नहीं है। वह जो कुछ भी कमाता है ,जो कुछ भी
बनाता है ,वह दूसरों के लिए भी करता है और दूसरों की सहायता से भी
करता है।
प्रस्तुत पाठ का कवि
अपनों के सुख – दुःख की चिंता करने वालों को मनुष्य तो मानता है
परन्तु यह मानने को तैयार नहीं है कि उन मनुष्यों में मनुष्यता के सारे गुण होते
हैं। कवि केवल उन मनुष्यों को महान मानता है जो अपनों के सुख – दुःख से पहले दूसरों की चिंता करते हैं। वह मनुष्यों में ऐसे गुण चाहता है
जिसके कारण कोई भी मनुष्य इस मृत्युलोक से चले जाने के बाद भी सदियों तक दूसरों की
यादों में रहता है अर्थात वह मृत्यु के बाद भी अमर रहता है। आखिर क्या है वे गुण ? यह इस पाठ में जानेंगे –
मनुष्यता पाठ सार
इस कविता में कवि
मनुष्यता का सही अर्थ समझाने का प्रयास कर रहा है। पहले भाग में कवि कहता है कि
मृत्यु से नहीं डरना चाहिए क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है पर हमें ऐसा कुछ करना
चाहिए कि लोग हमें मृत्यु के बाद भी याद रखें। असली मनुष्य वही है जो दूसरों के
लिए जीना व मरना सीख ले। दूसरे भाग में कवि कहता है कि हमें उदार बनना चाहिए
क्योंकि उदार मनुष्यों का हर जगह गुण गान होता है। मनुष्य वही कहलाता है जो दूसरों
की चिंता करे। तीसरे भाग में कवि कहता है कि पुराणों में उन लोगों के बहुत
उदाहरण हैं जिन्हे उनकी त्याग भाव के लिए आज भी याद किया जाता है। सच्चा
मनुष्य वही है जो त्याग भाव जान ले। चौथे भाग में कवि कहता है कि मनुष्यों के मन
में दया और करुणा का भाव होना चाहिए, मनुष्य वही कहलाता है जो दूसरों के लिए मरता और जीता है। पांचवें भाग में
कवि कहना चाहता है कि यहाँ कोई अनाथ नहीं है क्योंकि हम सब उस एक ईश्वर की
संतान हैं। हमें भेदभाव से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए।छठे भाग में कवि कहना चाहता है
कि हमें दयालु बनना चाहिए क्योंकि दयालु और परोपकारी मनुष्यों का देवता भी स्वागत
करते हैं। अतः हमें दूसरों का परोपकार व कल्याण करना चाहिए।सातवें भाग में कवि
कहता है कि मनुष्यों के बाहरी कर्म अलग अलग हो परन्तु हमारे वेद साक्षी है की सभी
की आत्मा एक है ,हम सब एक ही ईश्वर की संतान है अतः सभी मनुष्य
भाई -बंधु हैं और मनुष्य वही है जो दुःख में दूसरे मनुष्यों के काम आये।अंतिम भाग
में कवि कहना चाहता है कि विपत्ति और विघ्न को हटाते हुए मनुष्य को अपने चुने हुए
रास्तों पर चलना चाहिए ,आपसी समझ को बनाये रखना चाहिए और भेदभाव को
नहीं बढ़ाना चाहिए ऐसी सोच वाला मनुष्य ही अपना और दूसरों का कल्याण और उद्धार कर
सकता है।
मनुष्यता की पाठ व्याख्या
विचार लो कि मर्त्य हो
न मृत्यु से डरो कभी,
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो
वृथा मरे,
वृथा जिए,
मारा नहीं वही कि जो
जिया न आपके लिए।
वही पशु- प्रवृति
है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।
शब्दार्थ
मर्त्य – मृत्यु
यों – ऐसे
वृथा – बेकार
प्रवृनि – प्रवृति
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि बताना चाहता है कि मनुष्यों को कैसा जीवन जीना चाहिए।
व्याख्या -: कवि कहता
है कि हमें यह जान लेना चाहिए कि मृत्यु का होना निश्चित है, हमें मृत्यु से नहीं डरना चाहिए। कवि कहता है
कि हमें कुछ ऐसा करना चाहिए कि लोग हमें मरने के बाद भी याद रखे। जो मनुष्य दूसरों
के लिए कुछ भी ना कर सकें,
उनका जीना और मरना
दोनों बेकार है । मर कर भी वह मनुष्य कभी नहीं मरता जो अपने लिए नहीं दूसरों के
लिए जीता है,
क्योंकि अपने लिए तो
जानवर भी जीते हैं। कवि के अनुसार मनुष्य वही है जो दूसरे मनुष्यों के लिए मरे
अर्थात जो मनुष्य दूसरों की चिंता करे वही असली मनुष्य कहलाता है।

उसी उदार की कथा
सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा
कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव
कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त
सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम
विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ
उदार – महान ,श्रेष्ठ
बखानती – गुण गान करना
धरा – धरती
कृतघ्न – ऋणी , आभारी
सजीव – जीवित
कूजती – करना
अखण्ड – जिसके टुकड़े न किए जा सकें
असीम – पूरा
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि बताना चाहता है कि जो मनुष्य दूसरों के लिए जीते हैं उनका
गुणगान युगों –
युगों तक किया जाता है।
व्याख्या -: कवि कहता
है कि जो मनुष्य अपने पूरे जीवन में दूसरों की चिंता करता है उस महान व्यक्ति की
कथा का गुण गान सरस्वती अर्थात पुस्तकों में किया जाता है। पूरी धरती उस महान
व्यक्ति की आभारी रहती है। उस व्यक्ति की बातचीत हमेशा जीवित व्यक्ति की तरह की
जाती है और पूरी सृष्टि उसकी पूजा करती है। कवि कहता है कि जो व्यक्ति पुरे संसार
को अखण्ड भाव और भाईचारे की भावना में बाँधता है वह व्यक्ति सही मायने में मनुष्य
कहलाने योग्य होता है।
क्षुधार्त रंतिदेव ने
दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया
परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने
स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने
शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के
लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ
क्षुधार्त – भूख से परेशान
करस्थ – हाथ की
परार्थ – पूरा
अस्थिजाल – हड्डियों का समूह
उशीनर क्षितीश – उशीनर देश के राजा शिबि
सहर्ष – ख़ुशी से
शरीर चर्म – शरीर का कवच
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि ने महान पुरुषों के उदाहरण दिए हैं जिनकी महानता के कारण
उन्हें याद किया जाता है।
व्याख्या -: कवि कहता
है कि पौराणिक कथाएं ऐसे व्यक्तिओं के उदाहरणों से भरी पड़ी हैं जिन्होंने अपना
पूरा जीवन दूसरों के लिए त्याग दिया जिस कारण उन्हें आज तक याद किया जाता है। भूख
से परेशान रतिदेव ने अपने हाथ की आखरी थाली भी दान कर दी थी और महर्षि दधीचि ने तो
अपने पूरे शरीर की हड्डियाँ वज्र बनाने के लिए दान कर दी थी। उशीनर देश के
राजा शिबि ने कबूतर की जान बचाने के लिए अपना पूरा मांस दान कर दिया था। वीर कर्ण
ने अपनी ख़ुशी से अपने शरीर का कवच दान कर दिया था। कवि कहना चाहता है कि मनुष्य
इस नश्वर शरीर के लिए क्यों डरता है क्योंकि मनुष्य वही कहलाता है जो दूसरों के
लिए अपने आप को त्याग देता है।

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी
हुई स्वयं मही।
विरुद्धभाव बुद्ध का
दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न
सामने झुका रहा ?
अहा ! वही उदार है
परोपकार जो करे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ
सहानुभूति – दया,करुणा
महाविभूति – सब से बड़ी सम्पति
वशीकृता – वश में करने वाला
मही – ईश्वर
विरुद्धवाद – खिलाफ होना
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि ने महात्मा बुद्ध का उदाहरण देते हुए दया ,करुणा को सबसे बड़ा धन बताया है।
व्याख्या -: कवि कहता
है कि मनुष्यों के मन में दया व करुणा का भाव होना चाहिए ,यही सबसे बड़ा धन है। स्वयं ईश्वर भी ऐसे लोगों
के साथ रहते हैं । इसका सबसे बड़ा उदाहरण महात्मा बुद्ध हैं जिनसे लोगों का दुःख
नहीं देखा गया तो वे लोक कल्याण के लिए दुनिया के नियमों के विरुद्ध चले गए। इसके
लिए क्या पूरा संसार उनके सामने नहीं झुकता अर्थात उनके दया भाव व परोपकार के कारण
आज भी उनको याद किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। महान उस को कहा जाता है जो
परोपकार करता है वही मनुष्य ,मनुष्य
कहलाता है जो मनुष्यों के लिए जीता है और मरता है।
रहो न भूल के कभी मदांघ
तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न
गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीन बन्धु के
बड़े विशाल हाथ हैं।
अतीव भाग्यहीन है अधीर
भाव जो करे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।

शब्दार्थ
मदांघ – घमण्ड
तुच्छ – बेकार
सनाथ – जिसके पास अपनों का साथ हो
अनाथ – जिसका कोई न हो
चित्त – मन में
त्रिलोकनाथ – ईश्वर
दीनबंधु – ईश्वर
अधीर – उतावलापन
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि सम्पति पर कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए और किसी को
अनाथ नहीं समझना चाहिए क्योंकि ईश्वर सबके साथ हैं।
व्याख्या -: कवि कहता
है कि भूल कर भी कभी संपत्ति या यश पर घमंड नहीं करना चाहिए। इस बात पर कभी गर्व
नहीं करना चाहिए कि हमारे साथ हमारे अपनों का साथ है क्योंकि कवि कहता है कि यहाँ
कौन सा व्यक्ति अनाथ है ,उस ईश्वर का साथ सब के साथ है। वह बहुत दयावान
है उसका हाथ सबके ऊपर रहता है। कवि कहता है कि वह व्यक्ति भाग्यहीन है जो इस
प्रकार का उतावलापन रखता है क्योंकि मनुष्य वही व्यक्ति कहलाता है जो इन सब चीजों
से ऊपर उठ कर सोचता है।

अनंत अंतरिक्ष में अनंत
देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो
बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
परस्परावलंब से उठो तथा
बढ़ो सभी,
अभी अमर्त्य-अंक में
अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यां कि एक से न
काम और का सरे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।
शब्दार्थ
अनंत – जिसका कोई अंत न हो
अंतरिक्ष – आकाश
समक्ष – सामने
परस्परावलंब – एक दूसरे का सहारा
अमर्त्य -अंक — देवता की गोद
अपंक – कलंक रहित
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि कलंक रहित रहने व दूसरों का सहारा बनने वाले
मवषयों का देवता भी स्वागत करते हैं।

व्याख्या -: कवि कहता
है कि उस कभी न समाप्त होने वाले आकाश में असंख्य देवता खड़े हैं, जो परोपकारी व दयालु मनुष्यों का सामने से
खड़े होकर अपनी भुजाओं को फैलाकर स्वागत करते हैं। इसलिए दूसरों का सहारा बनो और
सभी को साथ में लेकर आगे बड़ो। कवि कहता है कि सभी कलंक रहित हो कर देवताओं
की गोद में बैठो अर्थात यदि कोई बुरा काम नहीं करोगे तो देवता तुम्हे अपनी गोद में
ले लेंगे। अपने मतलब के लिए नहीं जीना चाहिए अपना और दूसरों का कल्याण व उद्धार
करना चाहिए क्योंकि इस मरणशील संसार में मनुष्य वही है जो मनुष्यों का कल्याण करे
व परोपकार करे।
‘मनुष्य मात्रा बन्धु हैं’ यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू
पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य
बाह्य भेद हैं,

परंतु अंतरैक्य में
प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बन्धु ही न
बन्धु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।
शब्दार्थ
बन्धु – भाई बंधु
विवेक – समझ
स्वयंभू – परमात्मा,स्वयं उत्पन्न होने वाला
अंतरैक्य – आत्मा की एकत, अंतःकरण की एकता
प्रमाणभूत – साक्षी
व्यथा – दुःख,कष्ट
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि हम सब एक ईश्वर की संतान हैं। अतः हम सभी मनुष्य
एक – दूसरे के भाई – बन्धु हैं।
व्याख्या -: कवि कहता
है कि प्रत्येक मनुष्य एक दूसरे के भाई – बन्धु हैं ।यह सबसे बड़ी समझ है। पुराणों में जिसे स्वयं उत्पन्न पुरुष मना
गया है, वह परमात्मा या ईश्वर हम सभी का पिता है, अर्थात सभी मनुष्य उस एक ईश्वर की संतान हैं।
बाहरी कारणों के फल अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्म भले ही अलग अलग हों
परन्तु हमारे वेद इस बात के साक्षी है कि सभी की आत्मा एक है। कवि कहता है कि यदि
भाई ही भाई के दुःख व कष्टों का नाश नहीं करेगा तो उसका जीना व्यर्थ है क्योंकि
मनुष्य वही कहलाता है जो बुरे समय में दूसरे मनुष्यों के काम आता है।
चलो अभीष्ट मार्ग में
सहर्ष खेलते हुए,

विपत्ति,विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क
पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि
तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो
मनुष्य के लिए मरे।।

अभीष्ट – इच्छित
मार्ग – रास्ता
सहर्ष -अपनी खुशी से
विपत्ति,विघ्न – संकट ,बाधाएँ
अतर्क – तर्क से परे
सतर्क – सावधान यात्री
प्रसंग -: प्रस्तुत
कविता हमारी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श भाग -2 ‘ से ली गई है। इसके कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं।
इन पंक्तिओं में कवि कहता है कि यदि हम ख़ुशी से,सारे कष्टों को हटते हुए ,भेदभाव रहित रहेंगे तभी संभव है की समाज की
उन्नति होगी।
व्याख्या -: कवि कहता है कि मनुष्यों को अपनी इच्छा से चुने हुए मार्ग में
ख़ुशी ख़ुशी चलना चाहिए,रास्ते में कोई भी संकट या बाधाएं आये, उन्हें हटाते चले जाना चाहिए। मनुष्यों
को यह ध्यान रखना चाहिए कि आपसी समझ न बिगड़े और भेद भाव न बड़े। बिना किसी तर्क
वितर्क के सभी को एक साथ ले कर आगे बढ़ना चाहिए तभी यह संभव होगा कि मनुष्य दूसरों
की उन्नति और कल्याण के साथ अपनी समृद्धि भी कायम करे
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